उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड), जो 1921 में स्थापित हुआ था, ने हाल ही में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए लिंग परिवर्तन करने वाले विद्यार्थियों के प्रमाणपत्रों में संशोधन करना शुरू किया है। पहले ऐसे मामलों में, जब कोई विद्यार्थी लिंग परिवर्तन कराता था, तो उसे अपने परीक्षा परिणामों और प्रमाणपत्रों में संशोधन करने की अनुमति नहीं मिलती थी। लेकिन अब, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत, यह प्रक्रिया आसान हो गई है और इस बदलाव के बाद ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों को अपने नए लिंग के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं।
यह बदलाव सामाजिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे न केवल लिंग परिवर्तन करने वालों के अधिकारों का सम्मान होता है, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाता है कि समाज में समानता और समावेशिता की भावना बनी रहे। यूपी बोर्ड का यह कदम न केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन है, बल्कि यह एक सकारात्मक सामाजिक बदलाव का भी प्रतीक है।
लिंग परिवर्तन के बाद प्रमाणपत्र संशोधन की प्रक्रिया
लिंग परिवर्तन के बाद, किसी विद्यार्थी को अपना प्रमाणपत्र संशोधित कराने के लिए कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। सबसे पहले, संबंधित विद्यार्थी को जिलाधिकारी (डीएम) से प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है, जो यह प्रमाणित करता है कि लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यह प्रमाणपत्र तब मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई जांच के बाद जारी किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि लिंग परिवर्तन सही तरीके से हुआ है।
इसके बाद, यूपी बोर्ड में यह आवेदन प्रस्तुत किया जाता है, जिसके आधार पर संबंधित विद्यार्थी के नाम और लिंग के अनुसार प्रमाणपत्र में बदलाव किया जाता है। यह नया प्रमाणपत्र अब विद्यार्थी के नए लिंग और नाम के अनुसार जारी किया जाता है।
ट्रांसजेंडर अधिकारों की सुरक्षा में कानून का योगदान
भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कई कानूनी पहलें की गई हैं। 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पारित किया गया था, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उनके लिंग पहचान के अधिकार की कानूनी मान्यता दी गई। इस कानून के तहत, लिंग परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को अपने प्रमाणपत्रों में संशोधन का अधिकार दिया गया है। इसके साथ ही, ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को समाज में समान अवसर और अधिकार मिलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
ये भी पढे : विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) – VB-G RAM G: मनरेगा का बदलाव
इस कानून के प्रभाव से अब ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपनी पहचान को कानूनी तौर पर दर्ज करवा सकते हैं, जिससे उन्हें शिक्षा, रोजगार, और अन्य सामाजिक अधिकारों में किसी प्रकार के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता। यूपी बोर्ड के इस कदम से न केवल कानूनी मान्यता मिली है, बल्कि यह सामाजिक समावेशिता की ओर भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
लिंग परिवर्तन के प्रमाणपत्र से जुड़ी दिक्कतें
पहले यूपी बोर्ड में लिंग परिवर्तन के आधार पर प्रमाणपत्र में संशोधन करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। उदाहरण के लिए, 2017 में लखनऊ के एक पुरुष से महिला बने विद्यार्थी ने अपने 2011 के हाईस्कूल प्रमाणपत्र में नाम परिवर्तन का अनुरोध किया था, लेकिन बोर्ड अधिकारियों ने यह कहते हुए आवेदन को निरस्त कर दिया था कि इस प्रक्रिया के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
इस प्रकार के मामलों में विद्यार्थियों को न केवल मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता था, बल्कि उनका भविष्य भी प्रभावित हो सकता था। लिंग परिवर्तन के बाद यदि उनके प्रमाणपत्र में उनका पुराना नाम और लिंग दर्ज रहता था, तो यह उनके सामाजिक और पेशेवर जीवन में परेशानी पैदा कर सकता था। ऐसे मामलों में नए प्रमाणपत्र के बिना विद्यार्थियों को शिक्षा, नौकरी और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में कठिनाई होती थी।
बोर्ड द्वारा उठाया गया ऐतिहासिक कदम
लेकिन हाल के वर्षों में यूपी बोर्ड ने इस समस्या का समाधान निकालने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। 2025 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यूपी बोर्ड ने संशोधित प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को लागू किया। इस आदेश ने यह सुनिश्चित किया कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों के लिए उनके प्रमाणपत्र उनके लिंग पहचान के आधार पर संशोधित किए जाएंगे।
इसके बाद, यूपी बोर्ड ने सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को निर्देश दिए हैं कि वे ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों को उनके लिंग के अनुरूप प्रमाणपत्र जारी करें। इस कदम से विद्यार्थियों को न केवल कानूनी अधिकार मिलते हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया है कि वे समाज में भेदभाव का सामना किए बिना अपने जीवन के अगले चरण में कदम रख सकें।
ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए सुरक्षित वातावरण
सिर्फ प्रमाणपत्र ही नहीं, यूपी बोर्ड ने इसके साथ-साथ शिक्षण संस्थाओं को भी निर्देश दिए हैं कि वे ट्रांसजेंडर छात्रों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और समावेशी वातावरण सुनिश्चित करें। यह दिशा-निर्देश इस बात को ध्यान में रखते हुए दिए गए हैं कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार का उत्पीड़न और भेदभाव न हो।
इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ट्रांसजेंडर छात्र-छात्राएं और कर्मचारी बिना किसी डर या भेदभाव के अपनी शिक्षा पूरी करें और कामकाजी जीवन में अपनी पहचान को सम्मानपूर्वक जी सकें। यह कदम समाज में समावेशिता और समानता को बढ़ावा देने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब किसी व्यक्ति को उसके लिंग, पहचान, या समाज के अन्य भेदभाव से स्वतंत्र होकर जीवन जीने का अधिकार मिल जाता है, तो वह अपने जीवन में बेहतर तरीके से सफल हो सकता है।









1 thought on “उत्तर प्रदेश में कक्षा 10 और 12 के प्रमाण पत्रों पर लिंग और नाम अपडेट करने की मिली अनुमति”